
मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा (Maa Danteshwari Mandir Dantewada)
छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा के जिला मुख्यालय में स्थित है मां दंतेश्वरी का मंदिर को देश का 52वां शक्तिपीठ माना जाता है। डंकिनी और शंखिनी नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर का जीर्णोद्धार पहली बार वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के राजाओं ने करीब 700 साल पहले करवाया था। 1883 तक यहां नर बलि होती रही है। 1932-33 में दंतेश्वरी मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार तत्कालीन बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने कराया था। मंदिर का निर्माण 14वीं सदी में चालुक्य राजाओं ने दक्षिण भारतीय वास्तुकला से बनावाया था। यहां देवी की षष्टभुजी काले रंग की मूर्ति स्थापित है। छह भुजाओं में देवी ने दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बांए हाथ में घटी, पद्घ और राक्षस के बाल धारण किए हुए हैं। मंदिर में देवी के चरण चिन्ह भी मौजूद हैं।
इतिहास : केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए यह स्थल पहले दंतेवला और अब दंतेवाड़ा के नाम से चर्चित है। नदी किनारे आठ भैरव भाइयों का आवास माना जाता है, इसलिए यह स्थल तांत्रिकों की भी साधना स्थली है।
हां नलयुग से लेकर छिंदक नाग वंशीय काल की दर्जनों मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। मां दंतेश्वरी को बस्तर राज परिवार की कुल देवी माना जाता है, परंतु अब यह समूचे बस्तरवासियों की अधिष्ठात्री हैं ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, काकतीय वंश के राजा अन्नम देव और बस्तर राज परिवार की यह कुल देवी है। कहते हैं जब अन्नम देव नाम के राजा देवी के दर्शन करने यहां आए तब देवी दंतेश्वरी ने उन्हें दर्शन देकर वरदान दिया था कि जहां तक वह जाएगा, वहां तक देवी उसके साथ चलेगी और उसका राज्य होगा। साथ ही देवी ने राजा से पीछे मुड़कर न देखने की शर्त रखी।
राजा कई दिनों तक बस्तर क्षेत्र में चलता रहा और देवी उसके पीछे जाती रही। जब शंकनी-डंकनी नदी के पास पहुंचे तो नदी पार करते समय राजा को देवी के पायल की आवाज सुनाई नहीं दी। तब राजा पीछे मुड़कर देखा और देवी वहीं ठहर गईं। इसके बाद राजा ने वहां मंदिर निर्माण कर नियमित पूजा-आराधना करने लगा।
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छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा के जिला मुख्यालय में स्थित है मां दंतेश्वरी का मंदिर को देश का 52वां शक्तिपीठ माना जाता है। डंकिनी और शंखिनी नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर का जीर्णोद्धार पहली बार वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के राजाओं ने करीब 700 साल पहले करवाया था। 1883 तक यहां नर बलि होती रही है। 1932-33 में दंतेश्वरी मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार तत्कालीन बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने कराया था। मंदिर का निर्माण 14वीं सदी में चालुक्य राजाओं ने दक्षिण भारतीय वास्तुकला से बनावाया था। यहां देवी की षष्टभुजी काले रंग की मूर्ति स्थापित है। छह भुजाओं में देवी ने दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बांए हाथ में घटी, पद्घ और राक्षस के बाल धारण किए हुए हैं। मंदिर में देवी के चरण चिन्ह भी मौजूद हैं।
इतिहास : केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए यह स्थल पहले दंतेवला और अब दंतेवाड़ा के नाम से चर्चित है। नदी किनारे आठ भैरव भाइयों का आवास माना जाता है, इसलिए यह स्थल तांत्रिकों की भी साधना स्थली है।
हां नलयुग से लेकर छिंदक नाग वंशीय काल की दर्जनों मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। मां दंतेश्वरी को बस्तर राज परिवार की कुल देवी माना जाता है, परंतु अब यह समूचे बस्तरवासियों की अधिष्ठात्री हैं ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, काकतीय वंश के राजा अन्नम देव और बस्तर राज परिवार की यह कुल देवी है। कहते हैं जब अन्नम देव नाम के राजा देवी के दर्शन करने यहां आए तब देवी दंतेश्वरी ने उन्हें दर्शन देकर वरदान दिया था कि जहां तक वह जाएगा, वहां तक देवी उसके साथ चलेगी और उसका राज्य होगा। साथ ही देवी ने राजा से पीछे मुड़कर न देखने की शर्त रखी।
राजा कई दिनों तक बस्तर क्षेत्र में चलता रहा और देवी उसके पीछे जाती रही। जब शंकनी-डंकनी नदी के पास पहुंचे तो नदी पार करते समय राजा को देवी के पायल की आवाज सुनाई नहीं दी। तब राजा पीछे मुड़कर देखा और देवी वहीं ठहर गईं। इसके बाद राजा ने वहां मंदिर निर्माण कर नियमित पूजा-आराधना करने लगा।
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